भारत में कंपनी का शासन 1773-1858 तक (महत्वपूर्ण अधिनियम)

भारत में कंपनी का शासन 1773-1858 तक (महत्वपूर्ण अधिनियम)

1600 में महारानी एलिजाबेथ द्वारा प्रस्तुत प्रथम चार्टर के द्वारा कंपनी को भारत में व्यापार करने का अधिकार प्राप्त हुआ अपने प्रारंभिक दशकों में कंपनी भारत में सिर्फ व्यापार कर रही थी परंतु 1765 में पहली बार कंपनी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी के अधिकार प्राप्त कर लिए और इस प्रकार भारत पर कंपनी का शासन 1773 से शुरू हुआ जो कि 1857 में हुए विद्रोह के परिणामस्वरूप 1858 में खत्म हुआ जिसके पश्चात ब्रिटिश ताज ने भारत का शासन संपूर्णत: अपने हाथों में ले लिया।

1773-1858 तक कंपनी के अधिनियम 

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने शासन को बनाए रखने के लिए कई अधिनियम या चार्टर प्रस्तुत किए। ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रथम एक्ट 1773 में आया जिसे रेगुलेटिंग एक्ट के नाम से जाना जाता है और कंपनी का आखिरी अधिनियम 1853 में आया जिसे 1853 का चार्टर अधिनियम के नाम से जाना जाता है। अपने इन अधिनियमों के द्वारा कंपनी ने भारत में अनेक राजनितिक, आर्थिक और व्यापारिक परिवर्तन किये जिनकी व्याख्या निम्नलिखित है –

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 

इस अधिनियम के द्वारा भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्य को नियमित और नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया यह प्रथम कदम था। रेगुलेटिंग एक्ट के द्वारा भारत में प्रथम बार ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक और राजनीतिक कार्य को मान्यता प्राप्त हुई और इसी एक्ट के तहत भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी गई।

  1. बंगाल के गवर्नर को ‘बंगाल का गवर्नर जरनल’ नाम दिया गया।
  2. बंगाल के प्रथम गवर्नर जरनल लॉर्ड वॉरेन हेस्टिंग्स बने।
  3. इस अधिनियम से पहले सभी प्रेसिडेंसिओं के गवर्नर एक-दूसरे से अलग थे परन्तु इस अधिनियम के तहत अब मद्रास और बम्बई के गवर्नर ‘बंगाल के गवर्नर जरनल’ के अधीन हो गए।
  4. ब्रिटिश सरकार ने ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ का गठन किया जिसके माध्यम से कंपनी पर उनका नियंत्रण मजबूत हो गया जिसके तहत अब कंपनी को अब नागरिक और सैन्य मामलों की जानकारी ब्रिटिश सरकार को देना आवश्यक हो गया।

1781 का संशोधन अधिनियम (act of settlement)

1773 में आए रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए 1781 में एक नया अधिनियम लाया गया जिसे ‘एक्ट ऑफ सेटलमेंट’ के नाम से जाना जाता है। इस अधिनियम में 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की खामियों को दूर करने के लिए नए कानून बनाए गए।

पिट्स इंडिया एक्ट 1784 

ईस्ट इंडिया कंपनी का तीसरा महत्वपूर्ण अधिनियम ‘पिट्स इंडिया एक्ट 1784’ है इस अधिनियम की विशेषताएं निम्नलिखित है –

  1. इस अधिनियम के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के वाणिज्य से संबंधित कार्य और राजनैतिक कार्यों को अलग-अलग कर दिया गया।
  2. पिट्स इंडिया एक्ट 1784 दो कारणों से काफी महत्वपूर्ण था – प्रथम यह है कि इस अधिनियम के द्वारा भारत को ‘ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र’ कहा गया।
  3. दूसरा ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यों और उसके प्रशासन को पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया जबकि इससे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों पर ब्रिटिश सरकार का पूर्ण नियंत्रण नहीं था।

1786 का अधिनयम 

बंगाल के नए गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस की शर्तों को स्वीकार करने के लिए इस अधिनियम को लाया गया। लॉर्ड कार्नवालिस ने इस पद को स्वीकार करने से पहले 2 शर्ते रखी –

  1. जिनमें पहली शर्त थी कि विशेष मामलों में अपनी काउंसिल के निर्णय को ना मानने का गवर्नर जनरल के पास अधिकार होना चाहिए।
  2. दूसरी शर्त थी कि उसे बंगाल का गवर्नर जनरल बनाने के साथ commander-in-chief का पद भी दिया जाना चाहिए।

1793 का चार्टर अधिनियम या कानून

  1. 1793 के इस चार्टर अधिनियम के द्वारा बंगाल के गवर्नर जनरल को बंबई और मद्रास प्रेसिडेंसी की सरकारों के ऊपर नियंत्रण करने के लिएअधिक शक्ति प्रदान की गई।
  2. इस कानून के द्वारा भारत पर व्यापार के एकाधिकार को अगले 20 वर्षों की अवधि के लिए बढ़ा लिया गया।
  3. 1793 का चार्टर कानून में व्यवस्था दी गई कि ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ के सदस्यों के साथ-साथ उनके कर्मचारियों को भी भारतीय राजस्व से ही भुगतान किया जाना चाहिए।

चार्टर कानून 1813

  1. 1793 में बढ़ाये गए व्यापार के एकाधिकार को 20 वर्षों के पश्चात 1813 में समाप्त क्र दिया गया। अब सभी ब्रिटिश व्यापारी भारत में व्यापार कर सकते थे। चाय का वयापार तथा चीन के साथ वयापार के ऊपर कम्पनी का एकाधिकार अभी भी बहाल(continue) रखा गया।
  2. स्थानीय सरकारों को व्यक्तियों पर कर लगाने के लिए बाध्य किया अन्यथा दंड की व्यवस्था की गई।

1833 का चार्टर अधिनियम 

1833 का चार्टर अधिनियम के द्वारा बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल घोषित कर दिया गया। भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक बने, जिनको सभी नागरिक और सैन्य शक्तियां प्रदान की गई। इस अधिनियम के द्वारा बंबई और मद्रास के गवर्नरों को विधायिका संबंधी शक्ति से वंचित कर दिया गया।

इसी अधिनियम के अंतर्गत पुराने कानूनों को नियामक कानून कहा गया और इस अधिनियम के द्वारा बनाए गए नए कानूनों को एक्ट अथवा अधिनियम का नाम दिया गया और इसी अधिनियम के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक निकाय के रूप में की जाने वाली गतिविधियों को समाप्त कर दिया गया।

चार्टर एक्ट 1833 के द्वारा सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का आयोजन शुरू किया गया लेकिन बाद में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने इसका विरोध किया और इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया।

1853 का चार्टर अधिनियम 

इस अधिनियम के द्वारा पहली बार गवर्नर जनरल की परिषद के प्रशासनिक कार्य और वैधानिक कार्यों को अलग-अलग कर दिया गया। इस अधिनियम के तहत गवर्नर जनरल की परिषद में 6 नए पार्षद या सदस्य जोड़े गए जिन्हें विधान पार्षद का नाम दिया गया।

1853 के चार्टर अधिनियम के द्वारा भारत के गवर्नर जनरल के लिए एक नई विधान परिषद का गठन किया गया जिसे भारतीय विधान परिषद या केंद्रीय विधान परिषद का नाम दिया गया। इस परिषद ने छोटी संसद के रूप में कार्य किया इस संसद के द्वारा वह सभी प्रक्रियाएं अपनाई जाती थी जो ब्रिटिश संसद में अपनाई जाती थी।

इस अधिनियम के द्वारा सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता व्यवस्था का प्रारंभ किया गया और इसी अधिनियम में सिविल सेवा भारतीय नागरिकों के लिए भी खोल दी गई। इसके लिए 1854 में मैकाले समिति का गठन भी किया गया जिसका कार्य भारतीय सिविल सेवा के संबंध में रिपोर्ट तैयार करके ब्रिटिश सरकार को सौंपना था।

इस अधिनियम ने कंपनी के शासन को विस्तारित कर दिया और इसके साथ ही भारतीय क्षेत्र को इंग्लैंड राजशाही के विश्वास के तहत कब्जे में रखने का अधिकार दिया। जोकि एक महत्वपूर्ण निर्णय साबित हुआ।

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